ऐयारी करना शुरू किया। भगवानदत्त चपला की सूरत बना नौगढ़ में वीरेन्द्रसिंह को फंसाने के लिए चला। वहां पहुंचकर जिस कमरे में वीरेन्द्रसिंह थे उसके दरवाजे पर पहुंच पहरे वाले से कहा, ‘‘जाकर कुमार से कहो कि विजय गढ़ से चपला आई है।’’ उस प्यादे ने जाकर खबर दी। कुछ रात गुजर गई थी, कुंवर वीरेन्द्रसिंह चन्द्रकान्ता की याद में बैठे तबीयत से युक्तियां निकाल रहे थे, बीच-बीच में ऊंची सांस भी लेते जाते थे, उसी वक्त चोबदार ने आकर अर्ज किया-‘‘पृथ्वीनाथ, विजयगढ़ से चपला आई हैं और ड्योढ़ी पर खड़ी हैं। क्या हुक्म होता है ? कुमार चपला का नाम सुनते ही चौंक उठे और खुश होकर बोले, ‘‘उसे जल्दी अन्दर लाओ।’’ हुक्म के बमूजिब चपला हाजिर हुई, कुमार चपला को देख उठ खड़े हुए और हाथ पकड़ अपने पास बैठा बातचीत करने लगे, चन्द्रकान्ता का हाल पूछा। चपला ने कहा, ‘‘अच्छी हैं, सिवाय आपकी याद के और किसी तरह की तकलीफ नहीं है, हमेशा कह करती हैं
‘‘महाराज क्या कह रहे हैं ?’’ उसने कहा, ‘‘अभी महल से आये हैं, गुस्से से भरे बैठे हैं, आपको जल्दी बुलाया है।’’ यह सुनते ही क्रूरसिंह की नानी मर गई। डरता कांपता हरीसिंह महाराज के पास पहुंचा। महाराज ने क्रूरसिंह को देखते ही कहा, ‘‘क्यों बे क्रूर ! बेचारी चन्द्रकान्ता को इस तरह झूठ-मूठ बदनाम करना और हमारी इज्जत में बट्टा लगाना, यही तेरा काम है ? यह इतने आदमी जो बाग को घेरे हुए हैं अपने जी में क्या कहते होंगे ? नालायक, गधा, पाजी, तूने कैसे कहा कि महल में वीरेन्द्र है !’’ मारे गुस्से के महाराज जयसिंह के होंठ