इस बात का भी एकरारनामा लिख दिया जिससे वे दोनों बहुत ही खुश हुए। इसके बाद नाजिमने कहा, “इस वक्त हम लोग चन्द्रकान्ता के हालचाल की खबर लेने जाते हैं क्योंकि यह शाम का वक्त बहुत अच्छा है, चन्द्रकान्ता जरूर बाग में गई होगी और अपनी सखी चपला से अपनी विरह कहानी कहती होगी, इसलिए हमको इसका पता लगाना कोई मुश्किल न होगा कि आजकल बीरेन्द्रसिंह और चन्द्रकान्ता के बीच में क्या हो रहा है।” यह कह कर दोनों ऐयार क्रूरसिंह से बिदा हुए। चन्द्रकान्ता ( पहला भाग : तीसरा बयान) कुछ-कुछ दिन बाकी है, चन्द्रकान्ता, चपला और चम्पा बाग में टहल रही हैं। भीनी-भीनी फूलों की महक धीमी हवा के साथ मिलकर तबीयत को खुश कर रही है। तरह-तरह के फूल खिले हुए हैं। बाग के पश्चिम की तरफ वाले आम के घने पेड़ों की बहार और उसमें से अस्त होते हुए सूरज की किरणों की चमक एक अजीब ही मजा दे रही है। फूलों की क्यारियों की रविशों में अच्छी
उठ खड़े हुए और वीरेन्द्रसिंह को वहीं छोड़ पैदल विजयगढ़ की तरफ रवाना हुए। वीरेन्द्रसिंह भी घोड़े को दरख्त से खोल उस पर सवार हुए और अपने किले की तरफ चल चले गये। ऐयार उसको कहते हैं जो हर एक फन जानता हो, शक्ल बदलना और दौड़ना उसका मुख्य काम है। चन्द्रकान्ता ( पहला भाग : दुसरा बयान ) विजयगढ़ में क्रूरसिंह अपनी बैठक के अन्दर नाजिम और अहमद दोनों ऐयारों के साथ बैठा बातें कर रहा है। क्रूर – देखो नाजिम, महाराज को तो यह ख्याल है कि मैं राजा होकर मन्ञी के लड़के को कैसे दामाद बनाऊँ,