! दुहाई महाराज की, दुहाई ! दुहाई !!’’ बड़ी मुश्किल से सभी ने उसे चुप कराया। महाराज को बड़ा गुस्सा आया, हुक्म दिया, ‘‘क्रूरसिंह कहाँ है ?’’ चोबदार खबर लाया-‘‘बहुत बीमार हैं, उठ नहीं सकते।’’ रामलाल (तेजसिंह) दुहाई महाराज की ! यह भी उन्हीं की तरफ मिल गया, झूठ बोलता है ! मुसलमान सब उसके दोस्त हैं ; दुहाई महाराज की ! खूब तहकीकात की जाय !’’ महाराज ने मुंशी से कहा, ‘‘तुम जाकर पता लगाओ कि क्या मामला है ?’’ थोड़ी देर बाद मुंशी वापस आये औऱ बोले, ‘‘महाराज क्रूरसिंह घर पर नहीं है, और घरवाले कुछ बताते नहीं कि कहाँ गये हैं।’’ महाराज ने कहा, ‘‘जरूर चुनारगढ़ गया होगा। अच्छा, उसके यहाँ के किसी प्य़ादे को बुलाओ।’’ हुक्म पाते ही चोबदार गया और बदकिस्मत प्यादे को पकड़ लाया। महाराज ने पूछा, ‘‘क्रूरसिंह कहाँ गया है ?’’ प्यादे ने ठीक पता नहीं दिया। राम लाल ने फिर कहा, ‘‘दुहाई महाराज की, बिना मार
दरवाजा खोलने चले। दरवाजे के ऊपर एक बड़ा सा चेहरा शेर का बना हुआ था जिसके मुँह में हाथ बखूबी जा सकता था। तेजसिंह ने देवीसिंह से कहा, ‘‘इस चेहरे के मुंह में हाथ डालकर इसकी जुबान बाहर खींचो।’’ देवीसिंह ने वैसा ही किया और हाथ भर के करीब जुबान खींच ली। उसके खिंचते ही एक आवाज हुई और दरवाजा खुल गया। अहमद की गठरी लिए हुए दोनों अन्दर गये। देवीसिंह ने देखा कि वह खूब खुलासा जगह, बल्कि कोस भर का साफ मैदान है। चारों तरफ ऊँची-ऊँची पहाड़ियां जिन पर किसी तरह आदमी चढ़ नहीं सकता, बीच में एक छोटा-सा झरना पानी