को तो यह ख्याल है कि मैं राजा होकर मन्ञी के लड़के को कैसे दामाद बनाऊँ, और चन्द्रकान्ता बीरेन्द्रसिंह को चाहती है, अब कहो कि मेरा काम कैसे निकले? अगर सोचा जाय कि चन्द्रकान्ता को लेकर भाग जाऊं, तो कहाँ जाऊं और कहाँ रह कर आराम करूं? फिर ले जाने के बाद मेरे बाप की महाराज क्या दुर्दशा करेंगे? इससे तो यही मुनासिब होगा कि पहले बीरेन्द्रसिंह और उसके ऐयार तेजसिंह को किसी तरह गिरफ्तार कर किसी ऐसी जगह ले जाकर खपा ड़ाला जाय कि हजार वर्ष तक पता न लगे, और इसके बाद मौका पाकर महाराज को मारने की फिक्र की जाय फिर तो मैं झट गदी का मालिक बन जाऊंगा और तब अलबते अपनी जिन्दगी में चन्द्रकान्ता से ऐश कर सकूंगा। मगर यह तो कहो कि महाराज के मारने के बाद मैं गदी का मालिक कैसे बनूंगा? लोग मुझे राजा कैसे बनाएंगे? नाजिम – हमारे राजा के यहाँ बनिस्बत काफिरों के मुसलमान ज्यादा हैं, उन सभों को आपकी मदद के लिए मैं राजी कर सकता हूँ कि महाराज


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हो गई है। आपको ले चलना अभी मुझे पसन्द नहीं जब तक कि मैं वहां जाकर फसादियों को गिरफ्तार न कर लूं। “इस वक्त मैं फिर विजयगढ जाकर चन्द्रकान्ता और चपला से मुलाकात करता हूँ क्योंकि चपला ऐयारा और चन्द्रकान्ता की प्यारी सखी है और चन्द्रकान्ता को जान से ज्यादा मानती है। सिवाय इस चपला के मेरा साथ देने वाला वहां कोई नहीं है। जब मैं अपने दुश्मनों की चालाकी और कार्यवाई देख कर लौटूं तब आपके चलने के बारें में राय दूँ। कहीं ऐसा न हो कि बिना समझे बूझे काम करके हमलोग वहां ही गिरफ्तार हो जायं।” वीरेन्द्र – जो मुनासिब समझो करो, मुझको


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