नाजिंम और अहमद यहां आकर पुन: हमारे महाराज का दर्शन कर गये हैं। न मालूम किस चालाकी में आये थे? अफसोस उस वक्त मैं यहां न था। वीरेन्द्र – मुश्किल तो यह है कि तुम क्रूरसिंह के दोनों ऐयारों को फंसाया चाहते हो और वे लोग तुम्हारी गिरफ्तारी की फिक्र में हैं, परमेश्वर ही कुशल करे। खैर अब तुम जाओ और जिस तरह बने चन्द्रकान्ता से मेरी मुलाकात का बन्दोबस्त करो। तेजसिंह फौरन उठ खड़े हुए और वीरेन्द्रसिंह को वहीं छोड़ पैदल विजयगढ़ की तरफ रवाना हुए। वीरेन्द्रसिंह भी घोड़े को दरख्त से खोल उस पर सवार हुए और अपने किले की तरफ चल चले गये। ऐयार उसको कहते हैं जो हर एक फन जानता हो, शक्ल बदलना और दौड़ना उसका मुख्य काम है। चन्द्रकान्ता ( पहला भाग : दुसरा बयान ) विजयगढ़ में क्रूरसिंह अपनी बैठक के अन्दर नाजिम और अहमद दोनों ऐयारों के साथ बैठा बातें कर रहा है। क्रूर – देखो नाजिम, महाराज
से उसने अपने दोनों ऐयारों को जिनका नाम नाजिमअली और अहमदखां है इस बात की ताकीद कर दी है कि बराबर वे लोग महल की निगहबानी किया करें क्योंकि आपकी मुहब्बत का हाल क्रूरसिंह और उनके ऐयारों को बखूबी मालूम हो गया है। चाहे चन्द्रकान्ता क्रूरसिंह से बहुत ही नफरत करती है और राजा भी अपनी लड़की अपने मन्त्री के लड़के को नहीं दे सकता फिर भी उसे उम्मीद बंधी हुई है और आपकी लगावट बहुत बुरी मालूम होती है। अपने बाप के जरिये उसने महाराज जयसिंह के कान तक आपकी लगावट का हाल पहुँचा दिया है और इसी सबब से पहरे की यह सख्त तकीद