मैं पहले से सोच चुका हूँ। मैं इसको एक पहाड़ी खोह में रख आता हूँ जिसको मैं ही जानता हूँ। यह कह तेजसिंह ने फिर अहमद की गठरी बाँधी और एक प्यादे को भेजकर देवीसिंह नामी ऐयार को बुलाया जो तेजसिंह का शागिर्द, दिली दोस्त और रिश्ते में साला लगता था, तथा ऐयारी के फन में भी तेजसिंह से किसी तरह कम न था। जब देवीसिंह आ गये तब तेजसिंह ने अहमद की गठरी अपनी पीठ पर लादी और देवीसिंह से कहा, ‘‘आओ, हमारे साथ चलो, तुमसे एक काम है।’’ देवीसिंह ने कहा, ‘‘गुरुजी वह गठरी मुझको दो, मैं चलूं, मेरे रहते यह काम आपको अच्छा नहीं लगता।’’ आखिर देवीसिंह ने वह गठरी पीठ पर लाद ली और तेजसिंह के पीछे चल पड़े। वे दोनों शहर के बाहर ही जंगल और पहाड़ियों में घूमघुमौवे पेचीदे रास्तों में जाते-जाते दो कोस के करीब पहुंचकर एक अंधेरी खोह में घुसे। थोड़ी देर चलने के बाद कुछ रोशनी मिली। वहां जाकर तेजसिंह ठहर गये औऱ
किया ही था तो बाग के अन्दर जाने की इजाजात किसने दी थी ? यह कह कर चन्द्रकान्ता ने नाजिम के गिरफ्तार होने और बाग के तहखाने में कैद करने का सारा हाल तेजसिंह से कह सुनाया। तेजसिंह चपला की चालाकी सुनकर हैरान हो गये और मन-ही-मन उसको प्यार करने लगे, पर कुछ सोचने के बाद बोले, ‘‘चपला ने चालाकी तो खूब की मगर धोखा खा गई।’’ यह सुन चपला हैरान हो गई हाय राम ! मैंने क्या धोखा खाया ! पर कुछ समझ में नहीं आया। आखिर न रहा गया, तेजसिंह से पूछा, ‘‘जल्दी बताओ, मैंने क्या धोखा खाया ?’’ तेजसिंह ने