उतनी ही चन्द्रकान्ता मुझसे रखती है, और हमारे राज्य के बीच सिर्फ़ पाँच ही कोस का फासला भी है, तिस पर भी हमलोगों के किये कुछ नहीं बन पड़ता। देखो इस खत में भी चन्द्रकान्ता ने यही लिखा है कि ‘जिस तरह बने जल्द मिल जाओ।” तेजसिंह ने जवाब दिया, “मैं हर तरह से आपको वहां ले जा सकता हूँ मगर एक तो आजकल चन्द्रकान्ता के पिता महाराज जयसिंह ने महल के चारों तरफ सख्त पहरा बैठा रक्खा है, दुसरे उनके मन्त्री का लड़का क्रूरसिंह उस पर आशिक हो रहा है, ऊपर से उसने अपने दोनों ऐयारों को जिनका नाम नाजिमअली और अहमदखां है इस बात की ताकीद कर दी है कि बराबर वे लोग महल की निगहबानी किया करें क्योंकि आपकी मुहब्बत का हाल क्रूरसिंह और उनके ऐयारों को बखूबी मालूम हो गया है। चाहे चन्द्रकान्ता क्रूरसिंह से बहुत ही नफरत करती है और राजा भी अपनी लड़की अपने मन्त्री के लड़के को नहीं दे सकता फिर भी उसे उम्मीद बंधी हुई है और आपकी लगावट बहुत
का इकलौता लड़का है। तेजसिंह राजा सुरेन्द्रसिंह के दीवान जीतसिंह का प्यारा लड़का और कुंवर वीरेन्द्रसिंह का दिली दोस्त, बड़ा चालाक और फुर्तीला, कमर में सिर्फ खंजर बांधे, बगल में बटुआ लटकाये, हाथ में एक कमन्द लिए बड़ी तेजी के साथ चारों तरफ देखता और इनसे बातें करता जाता है। इन दोनों के सामने कसाकसाया चुस्त-दुरूस्त एक घोड़ा पेड़ से बंधा हुआ है। कुंवर वीरेन्द्रसिंह कह रहे हैं,”भाई तेजसिंह, देखो मुहब्बत भी क्या बुरी बला है जिसने इस दर्जे तक पहुँचा दिया। कई दफे तुम विजयगड़ जाकर राजकुमारी चन्द्रकान्ता की चीठी मेरे पास लाये और मेरी चीठी उन