केतकी ने जवाब दिया, ‘‘क्या मैं तुझसे कमजोर हूँ जो तू लात लगावेगी और मैं छोड़ दूंगी !’’ अब चपला से न रहा गया और केतकी का झोंटा पकड़ने के लिए दौड़ी, यहां तक कि दोनों आपस में गुंथ गईं। इत्तिफाक से चपला का हाथ नकली केतकी की छाती पर पड़ा जहाँ की सफाई देख वह घबरा उठी और झट से अलग हो गई। नकली केतकी: (हँसकर) क्यों, भाग क्यों गई ? आओ लड़ो ! चपला अपनी कमर से कटार निकाल सामने हुई और बोली, ‘‘ओ ऐयार, सच बता तू कौन है, नहीं तो अभी जान ले डालती हूँ !’’ इसका जवाब नकली केतकी ने चपला को कुछ न दिया और वीरेन्द्रसिंह की चिट्ठी निकाल कर सामने रख दी। चपला की नजर भी इस चिट्ठी पर पड़ी और गौर से देखने लगी। वीरेन्द्रसिंह के हाथ की लिखावट देख समझ गई कि यह तेजसिंह हैं, क्योंकि सिवाय तेजसिंह के और किसी के हाथ वीरेन्द्रसिंह कभी चीट्ठी नहीं भेजेंगे। यह सोच-समझ चपला शरमा गई


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यहाँ होगी ? हरामजादे के बच्चे, बेईमान, अपने बाप के कहने से तूने यह काम किया ? देख मैं उसकी भी तबीयत खुश कर देती हूँ !’’ यह कहकर फिर मारना शुरू किया, और पूछा, ‘‘सच बता, तू कैसे यहाँ आया और चम्पा कहाँ गई ?’’ मार के खौफ से नाजिम को असल हाल कहना ही पड़ा। वह बोला, ‘‘चम्पा को मैंने ही बेहोश किया था, बेहोशी की दवा छिड़ककर फूलों का गुच्छा उसके रास्ते में रख दिया जिसको सूँघकर वह बेहोश हो गयी, तब मैंने उसे मालती लता के कुंज में डाल दिया और उसकी सूरत बना उसके कपड़े पहन तुम्हारी तरफ चला आया। लो,


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