परेशान होंगे, अगर इजाजत हो तो मैं जाकर सबों से मिल आऊं !’’ महाराज ने कहा, ‘‘हाँ, जरूर तुमको वहाँ जाना चाहिए, जाओ, मगर जल्दी वापस चले आना।’’ इसके बाद महाराज ने हरदयालसिंह को हुक्म दिया, ‘‘तुम मेरी तरफ से तोहफा लेकर तेजसिंह के साथ नौगढ़ जाओ !’’ बहुत अच्छा’’ कह के हरदयालसिंह ने तोहफे का सामान तैयार किया और कुछ आदमी संग ले तेजसिंह के साथ नौगढ़ रवाना हुए। चपला जब महल में पहुंची, उसको देखते ही चन्द्रकान्ता ने खुश होकर उसे गले लगा लिया और थो़ड़ी देर बाद हाल पूछने लगी। चपला ने अपना पूरा हाल खुलासा तौर पर बयान किया। थोड़ी देर तक चपला और चन्द्रकान्ता में चुहल होती रही। कुमारी ने चम्पा की चालाकी का हाल बयान करके कहा कि, ‘‘तुम्हारी शागिर्दिन ने भी दो ऐयारों को गिरफ्तार किया है’ यह सुनकर चपला बहुत खुश हुई और चम्पा को जो उसी जगह मौजूद थी गले लगाकर बहुत शाबाशी दी। इधर तेजसिंह


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कि कुंवर वीरेन्द्रसिंह का हमेशा ध्यान रखिये और महाराज से बारबर उनकी तारीफ कीजिए जिससे महाराज मदद के वास्ते उनको भी बुलावें !’’ हरदयालसिंह ने कसम खाकर कहा, ‘‘मैं हमेशा तुम लोगों का खैरख्वाह हूँ, जो कुछ तुमने कहा है उससे ज्यादा कर दिखाऊंगा।’’ तेजसिंह ने ऐयारी की गठरी खोली और एक खुलासा बेड़ी उसके पैर में डाल तथा ऐयारी का बटुआ और खंजर उसके कमर से निकालने के बाद उसे होश में लाये। उसके चेहरे को साफ किया तो मालूम हुआ कि वह भगवानदत्त है। ऐयार होने के कारण चुनार के सब ऐयारों को तेजसिंह पहचानते


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