तेजसिंह को छुड़ा ले गई। मैंने अभी उन दोनों को उस सलई वाले जंगल में देखा है।’’ यह सुन महाराज को और भी ताज्जुब हुआ, हुक्म दिया कि बहुत से आदमी जायें और उनको पकड़ लावें, पर चोबदार ने अर्ज किया-‘‘महाराज इस तरह वे गिरफ्तार न होंगे, भाग जायेंगे, हाँ घसीटासिंह और चुन्नीलाल मेरे साथ चलें तो मैं दूर से इन लोगों को दिखला दूँ, ये लोग कोई चालाकी करके उन्हें पकड़ लें।’’ महाराज ने इस तरकीब को पसन्द करके दोनों ऐयारों को चोबदार के साथ जाने का हुक्म दिया। चोबदार ने उन दोनों को लिए हुए उस जगह पहुंचा जिस जगह उसने तेजसिंह का निशान देखा था, पर देखा कि वहाँ कोई नहीं है। तब घसीटासिंह ने पूछा, ‘‘अब किधर देखें ?’’ उसने कहा, ‘‘क्या यह जरूरी है कि वे तब से अब तक इसी पेड़ के नीचे बैठे रहें ? इधर-उधर देखिए, कहीं होंगे !’’ यह सुन घसीटासिंह ने कहा, ‘‘अच्छा चलो, तुम ही आगे चलो। वे लोग इधर-उधर ढूंढ़ने


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दिखाई जो महाराज ने लिख दी थी। चपला बहुत ही खुश हुई और बोली, ‘‘हरदयालसिंह तुम्हारे मेल में आ जायेगा, वह बहुत ही लायक है। अब तुम जाओ, इस काम को जल्दी करो।’’ चपला तेजसिंह की चालाकी की तारीफ करने लगी, अब वीरेन्द्रसिंह से मुलाकात होगी यह उम्मीद दिल में हुई। नकली हरदयालसिंह नौगढ़ की तरफ रवाना हुए, रास्ते में अपनी सूरत असली बना ली। चन्द्रकान्ता ( पहला भाग : चौदहवां बयान) नौगढ़ और विजयगढ़ का राज पहाड़ी है, जंगल भी बहुत भारी और घना है, नदियां चन्द्रप्रभा और कर्मनाशा घूमती हुईं इन पहाड़ों पर


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