हलचल मचा ही रक्खी थी, मदद के वास्ते एक तेजसिंह आया था सो कई दिन से उसका भी पता नहीं लगता, अब मुझे उसके लिए सुरेन्द्रसिंह से शर्मिन्दगी उठानी पड़ेगी। तेजसिंह का चाल-चलन, बात-चीत, इल्म और चालाकी पर जब खयाल करता हूँ, तबीयत उमड़ आती है। बड़ा लायक लड़का है। उसके चेहरे पर उदासी तो कभी देखी ही नहीं।’’ महारानी ने भी तेजसिंह के हाल पर बहुत अफसोस किया। इत्तिफाक से चपला उस वक्त वहीं खड़ी थी, यह हाल सुन वहाँ से चली और चन्द्रकान्ता के पास पहुंची। तेजसिंह का हाल जब कहना चाहती थी, जी उमड़ आता है, कुछ कह न सकती थी। चन्द्रकान्ता ने उसकी दशा देख पूछा, ‘‘क्यों ? क्या है ? इस वक्त तेरी अजब हालत हो रही है, कुछ मुंह से तो कह !’’ इस बात का जवाब देने के लिए चपला ने मुंह खोला ही था कि गला भर आया, आंखों से आंसू टपक पड़े, कुछ जवाब न दे सकी। चन्द्रकान्ता को और भी ताज्जुब हुआ, पूछा, ‘‘तू रोती क्यों है, कुछ बोल


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बैठा यह गाता हुआ दिखाई पड़ा- ‘‘गये चुनार क्रूर बहुरंगी लाये चारचितारी*। संग में उनके पण्डित देवता, जो हैं सगुन बिचारी।। इनसे रहना बहुत संभल के रमल चले अति कारी। क्या बैठे हो तुम बेफिकरे, काम करो कोई भारी।। यह आवाज कान में पड़ते ही तेजसिंह ने गौर से उस तरफ देखा। वह साधु भी इन्हीं की तरफ मुंह करके गा रहा था। तेजसिंह को अपनी तरफ देखते दांत निकालकर दिखला दिये और उठ के चलता बना। वीरेन्द्रसिंह अपनी चन्द्रकान्ता के ध्यान में डूबे हैं, उनको इन सब बातों की कोई खबर नहीं। वे नहीं जानते


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