और भगवानदत्त को खड़े देखकर बोले, ‘‘क्यों जी, तुम नौगढ़ गये थे ना ? क्या किया, खाली क्यों चले आये ?’’ तेजसिंह ने सबों को पहचानने के बाद जवाब दिया, ‘‘वहाँ तेजसिंह की बदौलत कोई कार्रवाई न चली, तुम लोगों में से कोई एक आदमी मेरे साथ चले तो काम बने !’’ पन्नाः अच्छा कल हम तुम्हारे साथ चलेंगे, आज चलो महल में कोई कार्रवाई करें। तेजसिंह: अच्छा चलो, मगर मुझको इस वक्त भूख बड़े जोर की लगी है, कुछ खा लूं तो काम में जी लगे। तुम लोगों के पास कुछ हो तो लाओ। जगन्नाथः पास में तो जो कुछ है बेहोशी मिला है, बाजार से जाकर कुछ लाओ तो सब कोई खा-पीकर छुट्टी करें। भगवानः अच्छा एक आदमी मेरे साथ चलो। पन्नालाल साथ हुए, दोनों शहर की तरफ चले। रास्ते में पन्नालाल ने कहा, ‘‘हम लोगों को अपनी सूरत बदल लेना चाहिए क्योंकि तेजसिंह कल से इसी शहर में आया है और हम सबों को पहचानता भी है, शायद


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झूठ बोलता है ! मुसलमान सब उसके दोस्त हैं ; दुहाई महाराज की ! खूब तहकीकात की जाय !’’ महाराज ने मुंशी से कहा, ‘‘तुम जाकर पता लगाओ कि क्या मामला है ?’’ थोड़ी देर बाद मुंशी वापस आये औऱ बोले, ‘‘महाराज क्रूरसिंह घर पर नहीं है, और घरवाले कुछ बताते नहीं कि कहाँ गये हैं।’’ महाराज ने कहा, ‘‘जरूर चुनारगढ़ गया होगा। अच्छा, उसके यहाँ के किसी प्य़ादे को बुलाओ।’’ हुक्म पाते ही चोबदार गया और बदकिस्मत प्यादे को पकड़ लाया। महाराज ने पूछा, ‘‘क्रूरसिंह कहाँ गया है ?’’ प्यादे ने ठीक पता नहीं दिया। राम लाल ने फिर कहा, ‘‘दुहाई


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