तमाशा देखने लगीं। चपला : न मालूम चम्पा किधर चली गयी? चन्द्रकान्ता : कहीं इधर- उधर घूमती होगी। चपला : दो घड़ी से ज्यादा हो गया, तब से वह हम लोगों के साथ नहीं है। चन्द्रकान्ता : देखो वह आ रही है। चपला : इस वक्त तो उसकी चाल में फर्क मालूम होता है। इतने में चम्पा ने आकर फूलों का एक गुच्छा चन्द्रकान्ता के हाथ में दिया और कहा, ‘‘देखिये, यह कैसा अच्छा गुच्छा बना लायी हूँ, अगर इस वक्त कुंवर वीरेन्द्रसिंह होते तो इसको देख मेरी कारीगरी की तारीफ करते और मुझको कुछ इनाम भी देते।’’ वीरेन्द्रसिंह का नाम सुनते ही एकाएक चन्द्रकान्ता का अजब हाल हो गया। भूली हुई बात फिर याद आ गई, कमल मुख मुरझा गया, ऊंची-ऊंची सांसें लेने लगी, आँखों से आँसू टपकने लगे। धीरे-धीरे कहने लगी, ‘‘न मालूम विधाता ने मेरे भाग्य में क्या लिखा है? न मालूम मैंने उस जन्म में कौन से-ऐसे पाप किये हैं जिनके बदले यह
मगर यह तो कहो कि महाराज के मारने के बाद मैं गदी का मालिक कैसे बनूंगा? लोग मुझे राजा कैसे बनाएंगे? नाजिम – हमारे राजा के यहाँ बनिस्बत काफिरों के मुसलमान ज्यादा हैं, उन सभों को आपकी मदद के लिए मैं राजी कर सकता हूँ कि महाराज के बाद आपको राजा मानें, मगर शर्त यह है कि काम हो जाने पर भी हमारे मजहब मुसलमानी को कबूल करें? क्रूरसिंह – अगर है तो तुम्हारी शर्त मैं दिलोजान से कबूल करता हूँ। अहमद – तो बस ठीक है, आप इस बात का एकरारनामा लिख कर मेरे हवाले करें, मैं सब मुसलमान भाइयों को दिखला कर